Veer Savarkar controversy: वीर सावरकर पर विवाद और ऐतिहासिक सत्य

Veer Savarkar controversy पर आधारित यह लेख सच्चाई, Andaman की सजा और “माफ़ीवीर” जैसे आरोपों का तथ्यात्मक विश्लेषण करता है।

Veer Savarkar controversy से जुड़ी वीर सावरकर की ऐतिहासिक तस्वीर

“Veer Savarkar controversy” — यह विषय भारत के राजनीतिक विमर्श में दशकों से विवादों और वैचारिक संघर्ष का केंद्र रहा है। सावरकर को लेकर एक पक्ष उन्हें आधुनिक भारत का प्रेरणास्रोत मानता है, तो दूसरा पक्ष उन्हें संदेह की निगाहों से देखता है — विशेषकर उनके जेल काल के दौरान अंग्रेजों को लिखी क्षमायाचिकाओं को लेकर। यह लेख इसी विवाद की गहराई में जाकर तथ्यों और इतिहास के आधार पर निष्पक्ष विवेचना करता है।

वीर सावरकर: क्रांति के अग्रदूत (Savarkar freedom fighter)

28 मई 1883 को जन्मे विनायक दामोदर सावरकर न केवल एक क्रांतिकारी नेता थे, बल्कि एक विचारक, लेखक और समाज-सुधारक भी थे। उनका जीवन राष्ट्र के प्रति समर्पण और साहस की मिसाल है। उन्होंने केवल भावनात्मक भाषणों तक अपनी भूमिका सीमित नहीं रखी, बल्कि उन्होंने संगठित क्रांतिकारी आंदोलन की स्पष्ट रूपरेखा खड़ी की।

सावरकर की क्रांतिकारी प्रेरणाएँ:

  • बाल गंगाधर तिलक और शिवाजी से प्रेरणा: तिलक की राजनीति और शिवाजी की रणनीति सावरकर की क्रांतिकारी चेतना की नींव बनी। उन्होंने स्वराज को केवल सपना नहीं, बल्कि लक्ष्य के रूप में देखा।
  • विदेश में शिक्षा के दौरान सक्रियता: लंदन में कानून की पढ़ाई के साथ-साथ उन्होंने इंडिया हाउस से जुड़कर क्रांतिकारियों को संगठित किया। वहां उन्होंने पर्चे बांटे, हथियारों की योजना बनाई और भारत की आज़ादी के लिए वैश्विक समर्थन जुटाया।
  • “मित्र मेला” से “Abhinav Bharat” तक: युवाओं को संगठित कर उन्होंने एक ऐसे नेटवर्क की स्थापना की जो ब्रिटिश साम्राज्य की नींव को चुनौती देने में सक्षम था।

उनकी सोच में राष्ट्रप्रेम और व्यावहारिकता का अद्भुत संतुलन था।

Savarkar Andaman punishment: आज़ादी की कीमत

1910 में लंदन से गिरफ्तारी के बाद सावरकर को भारत लाया गया और उन पर राजद्रोह का मुकदमा चला। उन्हें दो-दो आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। उन्हें अंडमान की कुख्यात सेल्युलर जेल भेजा गया जिसे ‘काला पानी’ कहा जाता था।

सेल्युलर जेल की भयावह सच्चाई:

  • अमानवीय जीवन स्थितियाँ: एकांत कोठरी, जिसमें न रोशनी थी, न हवा। कैदियों को जानवरों की तरह रखा जाता था।
  • शारीरिक उत्पीड़न: सावरकर को नारियल का तेल निकालने के लिए कोल्हू में बैल की तरह जोता जाता था। उन्हें भूखा रखा जाता, पीटा जाता और कई बार निर्वस्त्र कर अपमानित किया जाता।
  • मानसिक यातना: उन्हें किसी से संवाद की अनुमति नहीं थी। वर्षों तक अकेलेपन में बिताना मानसिक रूप से तोड़ देने वाला था।

इन सबके बावजूद सावरकर मानसिक रूप से कभी टूटे नहीं। उन्होंने जेल में रहकर कई कविताएँ और विचार लिखे, जिनमें भारतमाता के लिए उनका प्रेम झलकता है।

क्षमायाचिका या रणनीतिक पत्र? (Veer Savarkar apology का विश्लेषण)

आज जिन पत्रों को “माफ़ी” कहकर प्रचारित किया जाता है, वे दरअसल जेल प्रशासन को संबोधित आवेदन थे — जो हर राजनीतिक बंदी द्वारा उस समय किए जाते थे।

क्षमायाचिकाएँ: इतिहास की समझ से देखिए

  • सावरकर की रणनीति: वे जेल से बाहर निकलकर राजनीतिक-सामाजिक जागरूकता फैलाना चाहते थे। जेल में उनकी ऊर्जा बर्बाद हो रही थी, जबकि उन्हें जनता के बीच होना चाहिए था।
  • तथ्यों की रोशनी में: उनके द्वारा दी गई याचिकाएँ British Jail Manual के तहत स्वीकार्य प्रक्रिया थीं। ये ‘पेरोल’ या ‘रिव्यू’ जैसी प्रक्रियाओं से अलग नहीं थीं।
  • अन्य स्वतंत्रता सेनानियों की तरह: गांधी जी, नेहरू, पटेल सहित कई स्वतंत्रता सेनानियों ने भी ब्रिटिश सरकार से रिहाई की याचिकाएँ की थीं। लेकिन उन्हें “माफ़ीवीर” नहीं कहा जाता।

सावरकर की याचिकाएँ विचारशील रणनीति का हिस्सा थीं, जो एक जागरूक और दूरदर्शी राष्ट्रवादी के रूप में उनकी छवि को और पुष्ट करती हैं।

“माफ़ीवीर” कहने वालों की विचारधारा में गिरावट

कुछ राजनीतिक नेताओं ने पिछले वर्षों में सावरकर को “माफ़ीवीर” कहकर उपहास उड़ाया। यह एक ऐसा वक्तव्य है जो न केवल सावरकर के बलिदान का अपमान करता है, बल्कि देश के स्वतंत्रता संग्राम की गरिमा को भी ठेस पहुँचाता है।

विरोध या अपमान?

  • इतिहास से अज्ञानता या जानबूझ कर तोड़-मरोड़: जो लोग सावरकर के जेल जीवन और उनकी सोच को समझे बिना उन्हें “माफ़ीवीर” कहते हैं, वे या तो इतिहास नहीं जानते या जानबूझकर जनता को गुमराह कर रहे हैं।
  • स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका: क्या जिन्होंने संघर्ष नहीं किया, वे उन्हें नीचा दिखाने के अधिकारी हैं जिन्होंने अपना जीवन दाँव पर लगाया?
  • राजनीतिक ध्रुवीकरण: सावरकर की छवि को धूमिल करना एक वैचारिक एजेंडा है, जो एक खास वोटबैंक को साधने के लिए किया जाता है।

ऐसी आलोचनाएँ हमें यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि क्या आज़ादी के लिए बलिदान देने वालों का मूल्यांकन राजनीतिक चश्मे से किया जाना चाहिए?

Savarkar 1857 किताब: इतिहास को नया दृष्टिकोण

सावरकर की “1857 का स्वतंत्रता संग्राम” किताब ने इतिहास की धारा ही बदल दी। ब्रिटिश इसे ‘Mutiny’ कहते थे, लेकिन सावरकर ने इसे “भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम” सिद्ध किया।

विशेषताएँ:

  • इतिहास की पुनर्व्याख्या: उन्होंने बताया कि यह विद्रोह न केवल सिपाहियों का था, बल्कि इसमें जन-जन की भागीदारी थी।
  • हिंदू-मुस्लिम एकता पर बल: उन्होंने उल्लेख किया कि 1857 में धर्म से ऊपर उठकर भारतीयों ने संगठित संघर्ष किया।
  • ब्रिटिश सत्ता की प्रतिक्रिया: अंग्रेज़ों ने इस पुस्तक को प्रतिबंधित कर दिया, क्योंकि यह जनता को प्रेरित करने वाली और सत्ता विरोधी विचारों को प्रोत्साहन देने वाली थी।

इस पुस्तक के ज़रिए सावरकर एक विचारक और इतिहास-दृष्टा के रूप में सामने आए।

Abhinav Bharat Savarkar: युवा क्रांति की प्रयोगशाला

1904 में स्थापित यह संगठन सावरकर के नेतृत्व में युवा क्रांतिकारियों के लिए एक प्रयोगशाला बन गया था। यह पहली बार था जब क्रांतिकारी गतिविधियों को सुसंगठित और वैचारिक स्वरूप में ढाला गया।

संगठन के उद्देश्य:

  • युवाओं को क्रांति के लिए प्रेरित करना: कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में छात्रों के बीच राष्ट्रवाद और बलिदान की भावना जागृत करना।
  • हथियारों और रणनीतियों की योजना: भारत में हथियारों की आपूर्ति और उपयोग की व्यवस्था करना — जिसमें कई गुप्त मिशन शामिल थे।
  • स्वतंत्रता के लिए समर्पण: यह संगठन पूर्ण स्वराज्य को ही अपना अंतिम लक्ष्य मानता था।

Abhinav Bharat की विचारधारा ने आगे चलकर अनेक क्रांतिकारियों को प्रेरित किया, जिनमें चंद्रशेखर आज़ाद और भगत सिंह जैसे नाम शामिल हैं।

इतिहास बनाम राजनीति: सावरकर के नाम पर वोट की राजनीति?

आज के समय में सावरकर को लेकर जितनी चर्चा इतिहासकार नहीं करते, उससे कहीं अधिक राजनेता करते हैं। इसका उद्देश्य सावरकर के विचारों को समझना नहीं, बल्कि उन्हें एक प्रतीक बनाकर वोटों की खेती करना है।

  • इतिहास के बजाय एजेंडा: सावरकर का मूल्यांकन तटस्थ ऐतिहासिक नज़रिए से नहीं, बल्कि पार्टी विशेष की सोच से किया जाता है।
  • विवादों की राजनीति: हर चुनाव के समय “Veer Savarkar controversy” को उछालना एक ट्रेंड बन चुका है।
  • मूल्यांकन की निष्पक्षता: उनके योगदान को नकारने या बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने — दोनों ही तरीके इतिहास के साथ न्याय नहीं करते।

हमें तय करना होगा कि क्या हम अपने इतिहास को राजनीतिक हथियार बनाना चाहते हैं या प्रेरणा का स्रोत।

निष्कर्ष: Veer Savarkar controversy को ऐतिहासिक संदर्भ में देखें

वीर सावरकर जैसे व्यक्तित्व को एक शब्द “माफ़ीवीर” से आंकना न केवल तर्कहीन है, बल्कि एक वैचारिक दुर्बलता को भी उजागर करता है। उनका जीवन, उनका बलिदान, उनका लेखन — सब कुछ भारतीय राष्ट्रनिर्माण की नींव में जुड़ा है।

हमें यह समझना होगा कि इतिहास का सम्मान करना राष्ट्र का सम्मान करना है। और जो राष्ट्र अपने नायकों का सम्मान नहीं करता, वह भविष्य में नायक पैदा करने की क्षमता खो देता है।

FAQs:

Q1: Veer Savarkar controversy का मुख्य कारण क्या है?

A1: मुख्य विवाद अंग्रेजों को लिखी गई क्षमायाचिकाओं और उन्हें “माफ़ीवीर” कहे जाने को लेकर है।

Q2: क्या सावरकर ने सच में माफ़ी माँगी थी?

A2: उन्होंने जेल से बाहर आने की रणनीति के तहत याचिकाएँ दी थीं, न कि आत्मग्लानि से प्रेरित माफ़ी।

Q3: क्या अन्य नेताओं ने भी क्षमायाचिकाएँ दी थीं?

A3: हाँ, कई स्वतंत्रता सेनानियों ने जेल से छूटने के लिए पत्राचार किया था।

Q4: क्या सावरकर ने अंग्रेजों के पक्ष में काम किया?

A4: नहीं, जेल से छूटने के बाद भी उन्होंने राष्ट्रवादी विचारों का प्रचार जारी रखा।

Q5: सावरकर की सबसे प्रभावशाली रचना कौन सी थी?

A5: “1857 का स्वतंत्रता संग्राम”, जिसे अंग्रेजों ने बैन कर दिया था।


यह लेख उन सभी पाठकों के लिए समर्पित है जो इतिहास को राजनीति से ऊपर रखकर समझना चाहते हैं।

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