
भारत-बांग्लादेश संबंध: सहयोग से संदेह तक
1971 में बांग्लादेश की आज़ादी में भारत की निर्णायक भूमिका रही। इसके बाद दोनों देशों के बीच व्यापार, सुरक्षा, जल बंटवारे और सीमा प्रबंधन जैसे कई क्षेत्रों में सहयोग बढ़ा। लेकिन समय के साथ राजनीतिक नेतृत्व में बदलाव और वैचारिक ध्रुवीकरण ने रिश्तों में खटास पैदा की।
इस्लामिक कट्टरवाद की बढ़ती पकड़
बांग्लादेश में कुछ कट्टरपंथी संगठनों ने धर्म को राजनीति का हथियार बनाना शुरू किया। इन समूहों के लिए भारत एक आसान लक्ष्य है, क्योंकि:
- भारत को हिंदू राष्ट्र के रूप में पेश कर भावनात्मक ध्रुवीकरण किया जाता है
- ऐतिहासिक मुद्दों को तोड़-मरोड़ कर जनता के सामने रखा जाता है
- सोशल मीडिया के जरिए अफवाहें और नफरत फैलाई जाती हैं
इसका सीधा असर युवाओं की सोच और जनमत पर पड़ता है।
राजनीतिक अस्थिरता और सत्ता की लड़ाई
बांग्लादेश की राजनीति लंबे समय से तीव्र ध्रुवीकरण से गुजर रही है। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही कई बार भारत विरोधी बयानबाजी को राजनीतिक हथकंडे के रूप में इस्तेमाल करते हैं, ताकि जनता का ध्यान आंतरिक समस्याओं से हटाया जा सके।
चीन और वैश्विक शक्तियों की भूमिका
दक्षिण एशिया में चीन की बढ़ती मौजूदगी भी भारत-बांग्लादेश संबंधों को प्रभावित कर रही है। बुनियादी ढांचा, बंदरगाह परियोजनाएं और निवेश के जरिए चीन बांग्लादेश में अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है। इससे:
- भारत की रणनीतिक चिंताएं बढ़ती हैं
- बांग्लादेश के नीति-निर्णय अधिक संतुलनकारी लेकिन जटिल हो जाते हैं
भारत के लिए क्या हैं चुनौतियां?
भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह:
- कट्टरवाद और गलत धारणाओं का कूटनीतिक जवाब दे
- जन-स्तर पर संपर्क और सांस्कृतिक रिश्तों को मजबूत करे
- आर्थिक सहयोग और विकास परियोजनाओं को और प्रभावी बनाए
आगे का रास्ता
भारत-बांग्लादेश संबंध केवल सरकारों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि जनता-से-जनता के रिश्तों पर टिके हैं। यदि संवाद, पारदर्शिता और आपसी सम्मान बनाए रखा जाए, तो मौजूदा तनाव को अवसर में बदला जा सकता है।
निष्कर्ष
बांग्लादेश में भारत विरोधी रुख का कारण केवल एक तत्व नहीं है। इस्लामिक कट्टरवाद, घरेलू राजनीति और वैश्विक भू-राजनीति—तीनों मिलकर इस स्थिति को जन्म दे रहे हैं। भारत को संयम, कूटनीति और दीर्घकालिक रणनीति के साथ इस चुनौती का सामना करना होगा।
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