भारतीय राजनीति में अक्सर यह कहा जाता है कि “लोकतंत्र में असली ताक़त जनता के वोट में होती है”, लेकिन जब भी चुनाव आते हैं तो वोट चोरी (Vote Rigging), EVM हेरफेर और चुनाव आयोग की निष्पक्षता जैसे सवाल तेज़ी से उठते हैं। हाल ही में विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया कि भाजपा शासनकाल में चुनावों के दौरान वोट चोरी की घटनाएँ बढ़ी हैं।

मगर दिलचस्प बात यह है कि उपलब्ध आंकड़े इस धारणा को पूरी तरह समर्थन नहीं देते। वास्तव में, भाजपा शासन में बढ़ा विपक्ष का वोट शेयर यह दिखाता है कि कई विपक्षी दलों ने अपने वोट प्रतिशत को पहले से बेहतर बनाए रखा है, भले ही सत्ता भाजपा के हाथों में रही हो।
👉 यही कारण है कि इस विषय को समझना जरूरी है:
- वोट शेयर बढ़ने का क्या अर्थ है?
- क्या वोट शेयर और सीटों के बीच सीधा संबंध होता है?
- और क्या सचमुच वोट चोरी का नैरेटिव आँकड़ों की कसौटी पर खरा उतरता है?
इस आर्टिकल में हम इन्हीं सवालों का गहराई से विश्लेषण करेंगे।
🗳️ वोट शेयर क्या है और क्यों महत्वपूर्ण है?
वोट शेयर (Vote Share) का मतलब होता है किसी राजनीतिक पार्टी को कुल पड़े वोटों में से कितने प्रतिशत वोट मिले।
उदाहरण के लिए – यदि किसी चुनाव में कुल 10 करोड़ वोट पड़े और कांग्रेस को 2 करोड़ वोट मिले, तो कांग्रेस का वोट शेयर होगा 20%।
वोट शेयर के महत्व को समझने के 3 बड़े कारण:
- लोकप्रियता का मापदंड (Popularity Measure):
किसी पार्टी को समाज के कितने वर्गों का समर्थन मिल रहा है, यह सबसे स्पष्ट रूप से वोट शेयर से पता चलता है। - सीटों से अलग (Beyond Seats):
कभी-कभी किसी पार्टी का वोट शेयर बढ़ता है, लेकिन सीटें नहीं बढ़तीं। इसका कारण होता है फर्स्ट पास्ट द पोस्ट (First-Past-the-Post) प्रणाली, जिसमें जीत-हार का फैसला सबसे अधिक वोट पाने वाले उम्मीदवार से होता है, न कि कुल वोट प्रतिशत से। - दीर्घकालिक राजनीतिक प्रवृत्ति (Long-term Political Trend):
वोट शेयर बताता है कि समाज किस दिशा में सोच रहा है और भविष्य में किस पार्टी की पकड़ मजबूत हो सकती है।
👉 तालिका: वोट शेयर और सीटों का अंतर
| पार्टी | वोट शेयर (%) | सीटें (उदाहरण) | निष्कर्ष |
|---|---|---|---|
| पार्टी A | 40% | 250 | मजबूत पकड़ |
| पार्टी B | 30% | 150 | स्थिर स्थिति |
| पार्टी C | 20% | 50 | संघर्षरत लेकिन भविष्य में संभावनाएँ |
| पार्टी D | 10% | 0 | वोट मिले पर जीत में न बदल पाए |
📝 निष्कर्ष:
इसलिए, जब भी हम कहते हैं कि “भाजपा शासन में विपक्ष का वोट शेयर बढ़ा”, इसका मतलब है कि विपक्ष की लोकप्रियता घटने के बजाय बढ़ी है, भले ही सीटें भाजपा के पास ज़्यादा रही हों।
📊 भारतीय चुनावों में ऐतिहासिक वोट शेयर ट्रेंड
भारतीय लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि यहाँ चुनावी नतीजे केवल एक लहर या एक मुद्दे पर निर्भर नहीं करते, बल्कि लंबे समय में वोट शेयर (Vote Share Trends) हमें राजनीति की असली तस्वीर दिखाते हैं।
आइए देखें कि पिछले तीन दशकों (1990–2024) में प्रमुख राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों का वोट शेयर किस तरह बदलता रहा है।
🟦 कांग्रेस का वोट शेयर
कांग्रेस (Indian National Congress) भारत की सबसे पुरानी पार्टी है और लंबे समय तक देश की सत्ता में बनी रही। लेकिन 1990 के दशक के बाद से इसका वोट शेयर लगातार गिरावट और उतार-चढ़ाव का शिकार रहा।
- 1999: लगभग 28.3% वोट शेयर
- 2004: घटकर 26.5%
- 2009: थोड़ा सुधार कर 28.5%
- 2014: मोदी लहर में 19.5% पर सिमटी
- 2019: मामूली सुधार 19.7%
- 2024: बढ़कर 21.4% तक पहुँचा
👉 यानी, भाजपा शासनकाल (2014 के बाद) में लगातार “वोट चोरी” के आरोप लगने के बावजूद कांग्रेस का वोट शेयर गिरा नहीं बल्कि धीरे-धीरे बढ़ा है।
🟧 भाजपा का वोट शेयर
भारतीय जनता पार्टी (BJP) 1990 के दशक से धीरे-धीरे उभर रही थी, लेकिन 2014 के बाद से यह राष्ट्रीय राजनीति की धुरी बन गई।
- 1999: लगभग 23% वोट शेयर
- 2004: करीब 22%
- 2009: 18% (गिरावट)
- 2014: मोदी लहर के साथ 31%
- 2019: 37.4%
- 2024: लगभग 36.5%
👉 इसका मतलब है कि भाजपा ने अपने वोट शेयर को 20% से सीधे 35%+ पर स्थिर कर लिया। लेकिन ध्यान देने वाली बात यह है कि इसी दौरान विपक्ष का भी वोट शेयर घटा नहीं, बल्कि बढ़ा है।
🟥 क्षेत्रीय दलों का प्रभाव
भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में क्षेत्रीय दल (Regional Parties) हमेशा से अहम रहे हैं।
- राजद (RJD):
- 2010 में 18.8% वोट
- 2015 में लगभग वही रहा
- 2020 में बढ़कर 23.1%
- सपा (Samajwadi Party):
- उत्तर प्रदेश में 2019 में सीमित सीटें
- लेकिन 2024 में 37 सीटें जीतकर अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन
- टीएमसी (TMC), डीएमके (DMK), शिवसेना, आप (AAP):
इन दलों ने भी भाजपा शासनकाल में अपने-अपने राज्यों में वोट शेयर और सीट दोनों बढ़ाए।
👉 यानी विपक्षी दल केवल “कमज़ोर” नहीं हुए, बल्कि कई राज्यों में उन्होंने पहले से मजबूत पकड़ बनाई है।
📌 ट्रेंड का सारांश (Summary Table)
| वर्ष | कांग्रेस (%) | भाजपा (%) | क्षेत्रीय दल (%) |
|---|---|---|---|
| 1999 | 28.3 | 23 | 32 |
| 2004 | 26.5 | 22 | 35 |
| 2009 | 28.5 | 18 | 36 |
| 2014 | 19.5 | 31 | 32 |
| 2019 | 19.7 | 37.4 | 33 |
| 2024 | 21.4 | 36.5 | 41.3 |
📝 निष्कर्ष:
इतिहास हमें साफ बताता है कि वोट शेयर केवल भाजपा की तरफ नहीं गया है, बल्कि विपक्ष ने भी खासतौर पर 2014 के बाद से अपना वोट बेस मजबूत किया है। यही वह बिंदु है जो “वोट चोरी” वाले आरोपों को आंकड़ों की रोशनी में कमजोर साबित करता है।
🏛️ भाजपा शासनकाल और विपक्ष का वोट शेयर
2014 से लेकर 2024 तक का समय भारतीय राजनीति में भाजपा (BJP) के प्रभुत्व का दौर माना जाता है। लेकिन इसी दौरान कई विपक्षी दलों ने अपने वोट शेयर (Vote Share) में उल्लेखनीय बढ़ोतरी की।
आइए, कांग्रेस, राजद, सपा और अन्य दलों के प्रदर्शन को विस्तार से समझते हैं।
🔵 कांग्रेस (Congress) का प्रदर्शन
कांग्रेस को अक्सर कहा जाता है कि वह भाजपा की जीत की वजह से कमजोर होती जा रही है। लेकिन आंकड़े कुछ और कहानी कहते हैं।
- 2014: मोदी लहर में कांग्रेस का वोट शेयर गिरकर 19.5% रह गया।
- 2019: मामूली सुधार के साथ 19.7%।
- 2024: बढ़कर 21.4% तक पहुँचा।
👉 यानी, भाजपा शासनकाल में कांग्रेस का वोट शेयर लगातार तीन चुनावों में सुधरता रहा है।
कारण:
- युवाओं और शहरी वर्ग में पुनः पकड़ बनाने की कोशिश।
- गठबंधन (Alliance) राजनीति में सक्रिय भूमिका।
- क्षेत्रीय दलों के साथ मिलकर “विपक्षी मोर्चा” बनाने की रणनीति।
🔴 राजद (RJD) का प्रदर्शन
बिहार की राजनीति में राजद (Rashtriya Janata Dal) का वोट शेयर भी रोचक कहानी कहता है।
- 2010: वोट शेयर 18.8%।
- 2015: लगभग वही स्थिति (18.3%)।
- 2020: विपक्षी लहर और भाजपा शासनकाल में बढ़कर 23.1%।
👉 यानी, “वोट चोरी” का आरोप लगने के बावजूद राजद के वोट प्रतिशत में वृद्धि हुई।
🟠 समाजवादी पार्टी (SP) का प्रदर्शन
उत्तर प्रदेश में सपा (Samajwadi Party) का वोट शेयर भी भाजपा शासनकाल में ही सबसे मजबूत हुआ।
- 2014: केवल कुछ ही सीटें।
- 2019: वोट शेयर बढ़ा लेकिन सीटें कम रहीं।
- 2024: 37 सीटें जीतकर अब तक का सर्वकालिक सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन।
👉 यह दिखाता है कि भाजपा की मजबूत पकड़ वाले राज्य में भी विपक्ष ने वोट बेस मजबूत किया है।
🟣 अन्य क्षेत्रीय दलों का प्रदर्शन
- तृणमूल कांग्रेस (TMC): पश्चिम बंगाल में लगातार वोट शेयर और सीटों में बढ़त।
- डीएमके (DMK): तमिलनाडु में भाजपा शासनकाल के दौरान सत्ता में वापसी।
- आप (AAP): दिल्ली और पंजाब में वोट शेयर में उल्लेखनीय सफलता।
- शिवसेना (Uddhav faction): महाराष्ट्र में गठबंधन राजनीति से मजबूती।
📌 तुलनात्मक निष्कर्ष
| दल (Party) | वोट शेयर (2010/2014) | वोट शेयर (2020/2024) | ट्रेंड |
|---|---|---|---|
| कांग्रेस | 19.5% (2014) | 21.4% (2024) | सुधार |
| राजद | 18.8% (2010) | 23.1% (2020) | सुधार |
| सपा | 2014 में कमजोर | 2024 में सर्वश्रेष्ठ | सुधार |
| टीएमसी/डीएमके/आप | सीमित | राज्यों में बड़ी जीत | सुधार |
📝 निष्कर्ष:
स्पष्ट है कि भाजपा शासनकाल में विपक्षी दलों का वोट शेयर घटा नहीं बल्कि बढ़ा है। हालांकि भाजपा अपनी स्थिर 30–37% वोट शेयर पर कायम है, लेकिन विपक्ष भी 20% से 40% तक की मजबूती दिखा चुका है।
⚖️ वोट चोरी का नैरेटिव बनाम वास्तविक आंकड़े
भारतीय राजनीति में “वोट चोरी” (Vote Rigging / Manipulation) का नैरेटिव नया नहीं है। हर दौर में विपक्ष ने चुनाव आयोग या सत्ता पक्ष पर इस तरह के आरोप लगाए हैं। लेकिन जब हम वास्तविक आंकड़ों पर नज़र डालते हैं तो तस्वीर कुछ और ही नज़र आती है।
🟢 वोट चोरी का नैरेटिव क्यों उभरा?
- EVM विवाद (EVM Controversy):
कई बार Electronic Voting Machine की विश्वसनीयता पर सवाल उठे। - चुनाव आयोग की निष्पक्षता:
विपक्ष का आरोप रहा है कि आयोग सत्तारूढ़ दल के दबाव में काम करता है। - लगातार भाजपा की जीत:
2014, 2019 और 2024 में भाजपा का राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत प्रदर्शन ही इस नैरेटिव की जड़ है।
🔵 आंकड़े क्या कहते हैं?
- कांग्रेस: 2014 (19.5%) → 2024 (21.4%) → वोट शेयर बढ़ा
- राजद: 2010 (18.8%) → 2020 (23.1%) → वोट शेयर बढ़ा
- सपा: 2014 (कमजोर) → 2024 (37 सीटें) → इतिहास का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन
- क्षेत्रीय दल: कई राज्यों में सत्ता में वापसी
👉 यदि वास्तव में वोट चोरी होती, तो विपक्ष का वोट शेयर लगातार गिरना चाहिए था, लेकिन ऐसा हुआ नहीं।
📊 वोट चोरी बनाम वोट शेयर: तुलना
| पहलू | आरोप (Narrative) | वास्तविक आंकड़े (Data) |
|---|---|---|
| कांग्रेस का प्रदर्शन | वोट चोरी से कमजोर | वोट शेयर बढ़ा (19.5% → 21.4%) |
| राजद का प्रदर्शन | वोट कटवा राजनीति का शिकार | वोट शेयर बढ़ा (18.8% → 23.1%) |
| सपा का प्रदर्शन | भाजपा लहर में गायब | 2024 में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन |
| क्षेत्रीय दल | भाजपा दबाव में कमजोर | बंगाल, तमिलनाडु, पंजाब में मजबूती |
- भाजपा की जीत सच है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि विपक्ष का वोट बेस खत्म हो गया।
- भाजपा और विपक्ष दोनों का वोट शेयर बढ़ा, फर्क सिर्फ इतना है कि भाजपा ने इसे सीटों में बेहतर ढंग से कन्वर्ट किया।
- वोट चोरी का नैरेटिव राजनीतिक रणनीति के तौर पर प्रभावी हो सकता है, लेकिन आंकड़े इसे पूरी तरह सपोर्ट नहीं करते।
🧮 लोकतंत्र में वोट शेयर और सीटों का गणित
भारतीय लोकतंत्र में केवल वोट शेयर (Vote Share) ही तय नहीं करता कि किसकी सरकार बनेगी। दरअसल, हमारी चुनाव प्रणाली “फर्स्ट पास्ट द पोस्ट” (First-Past-The-Post – FPTP) है। इसका मतलब है कि जिस उम्मीदवार को किसी सीट पर सबसे ज्यादा वोट मिले, वही जीतता है — भले ही उसे कुल वोटों का आधा भी न मिला हो।
यही कारण है कि कभी-कभी एक पार्टी का वोट शेयर कम होते हुए भी ज्यादा सीटें आ जाती हैं और दूसरी पार्टी का वोट शेयर बढ़ने के बावजूद सीटें कम रह जाती हैं।
📌 वोट शेयर बनाम सीटों का उदाहरण
| पार्टी | वोट शेयर (%) | सीटें (लोकसभा उदाहरण) | निष्कर्ष |
|---|---|---|---|
| भाजपा | 36% | 280+ | वोट शेयर का अच्छा कन्वर्ज़न |
| कांग्रेस | 21% | 100 से कम | वोट शेयर बढ़ा लेकिन सीटें नहीं |
| क्षेत्रीय दल | 40% (राज्यों में मिलाकर) | 150+ | राज्यवार मजबूती लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर बिखरे |
👉 यहाँ साफ है कि भाजपा का वोट शेयर कांग्रेस और विपक्ष के मुकाबले इतना बड़ा नहीं, लेकिन सीटों की संख्या ज्यादा है क्योंकि भाजपा का वोट केंद्रित (Consolidated) है, जबकि विपक्षी वोट बिखरा (Scattered) है।
⚖️ वोट शेयर और सीटों के गणित की 3 मुख्य बातें
- केंद्रित बनाम बिखरा समर्थन:
भाजपा को कई राज्यों (उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात) में केंद्रित समर्थन मिला, जिससे कम वोट प्रतिशत में भी ज्यादा सीटें मिलीं। - गठबंधन की चुनौती:
विपक्षी दल अक्सर अलग-अलग चुनाव लड़ते हैं। नतीजतन, उनका वोट शेयर जुड़कर भले ही बड़ा हो, लेकिन सीटें कम रह जाती हैं। - क्षेत्रीय बनाम राष्ट्रीय राजनीति:
क्षेत्रीय दल अपने राज्यों में मजबूत होते हैं (जैसे टीएमसी, डीएमके, आप), लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर उनका वोट शेयर विखंडित हो जाता है।
📊 वास्तविक प्रभाव
- भाजपा: सीटों में बढ़त → केंद्र में सरकार।
- विपक्ष: वोट शेयर में बढ़त → भविष्य की संभावनाएँ।
📝 निष्कर्ष:
इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि “भाजपा शासन में विपक्ष का वोट शेयर बढ़ा” — लेकिन सीटों का गणित भाजपा के पक्ष में रहा। यही वजह है कि भाजपा सत्ता में है, जबकि विपक्ष वोट प्रतिशत में सुधार करने के बावजूद पीछे है।
🔮 भविष्य के लिए सीख: क्या वोट शेयर बढ़ना विपक्ष की मजबूती है?
वोट शेयर केवल आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह भविष्य की राजनीति की दिशा भी तय करता है। यदि भाजपा शासनकाल में विपक्ष का वोट शेयर बढ़ रहा है, तो यह भारतीय लोकतंत्र में कई संकेत देता है।
🟢 1. विपक्ष का सामाजिक आधार (Social Base) मजबूत हो रहा है
- कांग्रेस और क्षेत्रीय दल धीरे-धीरे नए युवा वोटरों और ग्रामीण वर्ग में अपनी पकड़ मजबूत कर रहे हैं।
- 2024 के चुनावों ने दिखाया कि भले ही भाजपा सत्ता में रही, लेकिन विपक्ष ने अपनी लोकप्रियता बढ़ाई है।
🟡 2. गठबंधन राजनीति (Alliance Politics) की अहमियत
- वोट शेयर बढ़ने का मतलब है कि यदि विपक्ष एकजुट होकर चुनाव लड़ता है, तो भाजपा को चुनौती और मजबूत होगी।
- उदाहरण: बिहार में महागठबंधन, उत्तर प्रदेश में सपा-कांग्रेस तालमेल।
🟠 3. लोकतंत्र की सेहत (Health of Democracy)
- विपक्ष का वोट शेयर बढ़ना इस बात का सबूत है कि लोकतंत्र में वैकल्पिक आवाज़ें (Alternative Voices) मौजूद हैं।
- अगर वोट शेयर लगातार एकतरफा होता, तो लोकतंत्र कमजोर हो सकता था।
🔴 4. भाजपा के लिए चेतावनी संकेत
- भले ही भाजपा की सीटें अधिक हों, लेकिन विपक्ष का वोट शेयर बढ़ना बताता है कि सत्ताविरोधी भावना (Anti-incumbency) धीरे-धीरे बन रही है।
- आने वाले चुनावों में भाजपा को अपनी रणनीति और नीतियों को और संतुलित करना होगा।
📊 भविष्य की संभावनाएँ: वोट शेयर बनाम सत्ता
| संभावित स्थिति (Future Scenario) | असर |
|---|---|
| विपक्ष का वोट शेयर और बढ़ता है | भाजपा को कड़ी चुनौती |
| विपक्षी गठबंधन मजबूत होता है | सीटों में भी भाजपा से टक्कर |
| विपक्ष बिखरा रहता है | भाजपा को लाभ मिलता रहेगा |
📝 निष्कर्ष:
भविष्य के लिए सबसे अहम सीख यही है कि वोट शेयर का बढ़ना विपक्ष की मजबूती का संकेत है, लेकिन यदि यह वोट बिखरा रहा तो सत्ता भाजपा के पास रहेगी। विपक्ष को वोट शेयर को सीटों में बदलने की रणनीति पर काम करना होगा।
📊 तालिका: पिछले 25 सालों का वोट शेयर तुलना
किसी भी राजनीतिक विश्लेषण को डेटा (Data) के बिना पूरा नहीं माना जा सकता। वोट शेयर के रुझानों को एक तालिका में देखने से स्पष्ट हो जाता है कि भाजपा शासनकाल में विपक्ष का वोट शेयर कैसे बदला और क्यों “वोट चोरी” का नैरेटिव आँकड़ों के सामने कमजोर पड़ता है।
🟢 लोकसभा चुनाव: कांग्रेस बनाम भाजपा बनाम विपक्ष (1999–2024)
| वर्ष | कांग्रेस वोट शेयर (%) | भाजपा वोट शेयर (%) | विपक्षी गठबंधन/क्षेत्रीय दल (%) | मुख्य संकेत |
|---|---|---|---|---|
| 1999 | 28.3 | 23.0 | 32.0 | कांग्रेस मजबूत, भाजपा उभरती |
| 2004 | 26.5 | 22.0 | 35.0 | यूपीए सत्ता में |
| 2009 | 28.5 | 18.0 | 36.0 | कांग्रेस का स्वर्ण क्षण |
| 2014 | 19.5 | 31.0 | 32.0 | मोदी लहर, कांग्रेस कमजोर |
| 2019 | 19.7 | 37.4 | 33.0 | भाजपा स्थिर, विपक्ष धीरे-धीरे बढ़ा |
| 2024 | 21.4 | 36.5 | 41.3 | भाजपा मजबूत, विपक्ष का वोट शेयर रिकॉर्ड स्तर पर |
🟡 विधानसभा चुनाव उदाहरण (बिहार और यूपी)
| राज्य | वर्ष | कांग्रेस वोट शेयर (%) | राजद/सपा (%) | भाजपा (%) | निष्कर्ष |
|---|---|---|---|---|---|
| बिहार | 2010 | 8.3 | 18.8 (राजद) | 39.0 | भाजपा/जदयू गठबंधन मजबूत |
| बिहार | 2020 | 9.5 | 23.1 (राजद) | 37.3 | राजद का सुधार |
| यूपी | 2014 | 7.5 | 22.0 (सपा) | 42.0 | भाजपा की लहर |
| यूपी | 2024 | 9.0 | 32.0 (सपा) | 39.0 | सपा का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन |
📝 तालिका से स्पष्ट निष्कर्ष:
- भाजपा ने अपने वोट शेयर को 30%+ पर स्थिर किया।
- कांग्रेस का वोट शेयर 2014 से लगातार बढ़ा है।
- क्षेत्रीय दलों (राजद, सपा, टीएमसी, डीएमके) का वोट शेयर भी उच्च स्तर पर पहुँचा।
- कुल मिलाकर, भाजपा शासनकाल में विपक्ष का वोट शेयर घटा नहीं, बल्कि बढ़ा है।
FAQ
1. क्या भाजपा शासनकाल में विपक्ष का वोट शेयर वास्तव में बढ़ा है?
हाँ ✅। आंकड़े बताते हैं कि 2014 में कांग्रेस का वोट शेयर 19.5% था, जो 2024 में बढ़कर 21.4% हो गया। इसी तरह राजद, सपा और अन्य क्षेत्रीय दलों का भी वोट शेयर भाजपा शासनकाल में बढ़ा है।
2. अगर विपक्ष का वोट शेयर बढ़ा है तो भाजपा की जीत कैसे होती रही?
भारतीय चुनाव प्रणाली “फर्स्ट पास्ट द पोस्ट” (FPTP) है। इसमें जीत का फैसला केवल सबसे अधिक वोट पाने वाले उम्मीदवार से होता है। विपक्ष का वोट शेयर भले ही बढ़ा हो, लेकिन वह बिखरा हुआ रहा, जबकि भाजपा का वोट शेयर केंद्रित रहा, जिससे भाजपा को ज्यादा सीटें मिलीं।
3. क्या “वोट चोरी” का आरोप सही है?
राजनीतिक दल अक्सर चुनाव आयोग और EVM पर सवाल उठाते हैं, लेकिन उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि विपक्ष का वोट शेयर लगातार बढ़ रहा है। अगर बड़े पैमाने पर वोट चोरी होती, तो विपक्ष का वोट शेयर घटता, जबकि इसके उलट सुधार दिख रहा है।
4. विपक्ष के लिए वोट शेयर बढ़ने का क्या मतलब है?
इसका मतलब है कि लोकप्रियता और समर्थन आधार (Support Base) धीरे-धीरे मजबूत हो रहा है। यदि विपक्ष एकजुट होकर चुनाव लड़े, तो भविष्य में भाजपा को कड़ी चुनौती दे सकता है।
5. क्या भविष्य में विपक्ष भाजपा को वोट शेयर के आधार पर हरा सकता है?
हाँ, लेकिन केवल तभी जब विपक्षी दल गठबंधन बनाकर वोटों का बिखराव रोकें। यदि विपक्ष एकजुट होता है और वोट शेयर को सीटों में बदलने की रणनीति अपनाता है, तो भाजपा की जीत आसान नहीं होगी।
आंकड़े यह साबित करते हैं कि भाजपा शासनकाल में विपक्ष का वोट शेयर घटा नहीं, बल्कि बढ़ा है। 2014 के बाद से कांग्रेस, राजद, सपा जैसे दलों ने अपने-अपने राज्यों और राष्ट्रीय स्तर पर वोट प्रतिशत में सुधार किया है।
इससे दो बड़े निष्कर्ष निकलते हैं:
- “वोट चोरी” का नैरेटिव आँकड़ों से मेल नहीं खाता।
अगर बड़े पैमाने पर वोट चोरी होती, तो विपक्ष का वोट शेयर बढ़ता नहीं, बल्कि घटता।- विपक्ष के लिए भविष्य की संभावना मौजूद है।
अगर विपक्षी दल वोट बिखराव (vote split) रोक दें और रणनीतिक गठबंधन बनाएँ, तो भाजपा की जीत आसान नहीं होगी।👉 इस प्रकार, चुनाव केवल वोट प्रतिशत पर नहीं, बल्कि सीटों के गणित, गठबंधन की मजबूती और रणनीति पर तय होते हैं।
