1991 आर्थिक सुधार भारत: नेतृत्व, नीतियां और बदलाव

1991 आर्थिक सुधार भारत के इतिहास, नेतृत्व, IMF और विश्व बैंक दबाव और नीति बदलाव का विश्लेषण, जिसने देश को नई दिशा दी।

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Credit: Finz Capital

1991 का वर्ष भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक निर्णायक मोड़ था। एक ऐसा मोड़, जिसने न केवल तत्कालीन आर्थिक संकट से देश को उबारा, बल्कि आगे आने वाले दशकों की विकास-यात्रा का रास्ता भी तय किया। उस समय की परिस्थितियों, नेतृत्व, और नीतिगत बदलावों का विश्लेषण करते हुए हम समझ सकते हैं कि आर्थिक सुधार केवल तत्कालीन ज़रूरत नहीं थे, बल्कि भारत के दीर्घकालिक हित में भी थे।

1991 से पहले भारत की आर्थिक तस्वीर

1991 से पहले भारत की अर्थव्यवस्था एक ऐसे ढांचे में बंधी हुई थी, जिसे आमतौर पर “लाइसेंस-राज” कहा जाता है। इस व्यवस्था के तहत किसी भी उद्योग को शुरू करने, उसका विस्तार करने या नए उत्पाद लॉन्च करने के लिए सरकार से विशेष अनुमति (लाइसेंस) लेना अनिवार्य था।

इस प्रणाली के कारण:

  • उद्योगों की स्वतंत्रता सीमित थी, और निवेशकों को हर निर्णय पर सरकारी दखल का सामना करना पड़ता था।
  • उत्पादन क्षमता पर कृत्रिम सीमा लगा दी जाती थी, जिससे उद्योग मांग के अनुसार विस्तार नहीं कर सकते थे।
  • आयात पर भारी नियंत्रण था, ताकि घरेलू उद्योगों को बचाया जा सके। लेकिन इसका नतीजा यह हुआ कि आधुनिक तकनीक और प्रतिस्पर्धा देश के भीतर नहीं आ पाई।
  • प्रतिस्पर्धा का लगभग अभाव था, क्योंकि बाज़ार में गिनी-चुनी कंपनियां थीं और वे भी अकसर अक्षमता (Inefficiency) से जूझ रही थीं।

समाजवादी नीतियों का उद्देश्य और सीमाएँ

स्वतंत्रता के बाद भारत ने समाजवादी प्रेरित नीतियों को अपनाया। इनके पीछे सोच यह थी कि गरीबी खत्म हो, आय का समान वितरण हो और सामाजिक न्याय सुनिश्चित हो। शुरुआती दशकों में इन नीतियों से कुछ सकारात्मक परिणाम भी मिले — जैसे हरित क्रांति (Green Revolution) और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों का निर्माण, जिसने रोजगार और आधारभूत ढांचे को बढ़ावा दिया।

लेकिन धीरे-धीरे इन नीतियों की सीमाएँ उजागर होने लगीं।

  • 1980 के दशक में भारत की औसत GDP वृद्धि दर मात्र 3–3.5% के आसपास रही, जिसे व्यंग्यात्मक रूप से “Hindu Rate of Growth” कहा गया।
  • गरीबी उन्मूलन की कोशिशों के बावजूद, 1990 तक भी आबादी का एक बड़ा हिस्सा गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहा था।
  • विदेशी निवेश लगभग न के बराबर था, और निजी क्षेत्र को बढ़ने का पर्याप्त अवसर नहीं मिल पाया।

1990-91 का गंभीर आर्थिक संकट

इन सभी कारकों का नतीजा 1990-91 में सामने आया, जब भारत को एक अभूतपूर्व भुगतान संतुलन संकट (Balance of Payments Crisis) का सामना करना पड़ा।

  • भारत का विदेशी मुद्रा भंडार केवल 1.2 बिलियन डॉलर तक गिर गया था, जो मुश्किल से दो से तीन हफ्तों के आयात भर के लिए पर्याप्त था।
  • उस समय भारत का राजकोषीय घाटा GDP का करीब 8% और चालू खाता घाटा 3% से अधिक हो चुका था।
  • इसी बीच 1990-91 का खाड़ी युद्ध (Gulf War) हुआ, जिससे तेल की कीमतें अचानक बढ़ गईं और भारत का आयात बिल और भी बढ़ गया।
  • निर्यात प्रतिस्पर्धा की कमी के कारण ठहर गया और घरेलू उत्पादन में भी कोई बड़ी वृद्धि नहीं हो रही थी।

स्थिति इतनी गंभीर थी कि भारत को स्वर्ण भंडार (Gold Reserves) तक गिरवी रखकर विदेशी मुद्रा जुटानी पड़ी। यह साफ संकेत था कि पुराने आर्थिक ढांचे में अब सुधार किए बिना आगे बढ़ना संभव नहीं था।

संकट की घड़ी और निर्णायक मोड़

1991 भारत के आर्थिक इतिहास का वह वर्ष था, जब देश को अपनी नीतियों और सोच में बुनियादी बदलाव करने पड़े। यह सिर्फ एक आर्थिक संकट नहीं था, बल्कि राजनीतिक, सामाजिक और अंतर्राष्ट्रीय कारकों का मिला-जुला परिणाम था।

भुगतान संतुलन संकट (Balance of Payments Crisis)

1990-91 में भारत का भुगतान संतुलन (BoP) बुरी तरह बिगड़ गया।

  • विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) केवल 1.2 बिलियन डॉलर तक रह गया था।
  • यह राशि भारत के महज दो से तीन हफ्तों के आयात के भुगतान के लिए ही पर्याप्त थी।
  • स्थिति इतनी गंभीर थी कि भारत को अपने 47 टन स्वर्ण भंडार को गिरवी रखकर IMF और अन्य विदेशी बैंकों से कर्ज लेना पड़ा।

संकट को गहराने वाले कारण

  1. तेल संकट और खाड़ी युद्ध (1990-91 Gulf War)
  • खाड़ी युद्ध के कारण कच्चे तेल की कीमतों में अचानक तेज़ वृद्धि हुई।
  • भारत, जो अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा आयात करता था, का आयात बिल बुरी तरह बढ़ गया।
  • युद्ध के कारण मध्य-पूर्व में काम कर रहे लाखों भारतीय मजदूरों को भी परेशानी हुई और विदेश से आने वाले रेमिटेंस (Remittances) घट गए।
  1. राजकोषीय और चालू खाता घाटा
  • 1990-91 में भारत का राजकोषीय घाटा GDP का लगभग 8% तक पहुँच गया।
  • चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) भी GDP का 3% से अधिक था, जो उस समय की स्थिति में अस्थिरकारी था।
  1. राजनीतिक अस्थिरता
  • 1989-1991 के बीच भारत में राजनीतिक अस्थिरता बढ़ी।
  • 1989 में राजीव गांधी की हार के बाद बनी वी.पी. सिंह सरकार ज़्यादा समय तक नहीं टिक पाई।
  • इसके बाद चंद्रशेखर सरकार भी महज़ कुछ महीनों में गिर गई।
  • इस अस्थिरता ने निवेशकों और अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के विश्वास को हिला दिया।
  1. निर्यात और औद्योगिक ठहराव
  • भारत का निर्यात कमजोर था और वैश्विक बाज़ारों में प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता बेहद सीमित थी।
  • घरेलू उद्योग लाइसेंस-राज और संरक्षणवाद (Protectionism) के चलते नवाचार और गुणवत्ता सुधार में पिछड़ गए थे।

अंतर्राष्ट्रीय दबाव और सहायता की शर्तें

संकट इतना गहरा था कि भारत को तत्काल अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक (World Bank) से वित्तीय सहायता माँगनी पड़ी।

  • IMF ने भारत को 2.2 बिलियन डॉलर का ऋण पैकेज देने पर सहमति जताई।
  • लेकिन इसके साथ कठोर शर्तें जुड़ी थीं —
  • अर्थव्यवस्था को खोलना (Liberalization),
  • सरकारी नियंत्रण कम करना (Deregulation),
  • विदेशी निवेश और व्यापार को बढ़ावा देना (Globalization),
  • और घाटे को कम करने के लिए राजकोषीय अनुशासन (Fiscal Discipline) अपनाना।

निर्णायक मोड़

यही वह क्षण था, जब भारतीय नेतृत्व ने यह महसूस किया कि अब पुराने समाजवादी ढांचे को जस का तस बनाए रखना संभव नहीं है। अगर सुधार नहीं किए जाते, तो भारत की अर्थव्यवस्था न केवल ठहर जाती बल्कि डिफॉल्ट (Default) की स्थिति में पहुँच सकती थी।

इस संकट ने भारत को मजबूर किया कि वह अपने आर्थिक मॉडल को दोबारा परिभाषित करे और एक नए रास्ते पर आगे बढ़े — यही रास्ता बाद में 1991 के आर्थिक सुधार (Economic Reforms) के रूप में सामने आया।

नेतृत्व की भूमिका — नीतियों से बदलाव तक

1991 का आर्थिक संकट केवल नीतिगत बदलाव का मामला नहीं था, बल्कि नेतृत्व की दूरदृष्टि, राजनीतिक साहस और निर्णय क्षमता का भी बड़ा उदाहरण है। भारत उस समय न केवल दिवालियापन के कगार पर था, बल्कि राजनीतिक अस्थिरता और सामाजिक दबाव भी बहुत गहरे थे। ऐसे समय में जिस तरह का नेतृत्व मिला, वही आर्थिक सुधारों की सफलता का आधार बना।

Dr. Manmohan Singh दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर करते हुए, 1991 आर्थिक सुधार के दौरान।

Credit: Mint

प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिम्हा राव का दृष्टिकोण

  • जून 1991 में जब पी. वी. नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बने, तब वे अपेक्षाकृत “कमज़ोर” और “समझौता करने वाले” नेता माने जाते थे। लेकिन प्रधानमंत्री बनने के तुरंत बाद उन्होंने यह दिखा दिया कि वे परिस्थिति की गंभीरता को गहराई से समझते हैं।
  • उन्होंने यह महसूस किया कि देश को केवल अस्थायी समाधान (जैसे स्वर्ण भंडार गिरवी रखकर कर्ज लेना) से नहीं बचाया जा सकता, बल्कि बुनियादी संरचनात्मक सुधार (Structural Reforms) की आवश्यकता है।
  • राव ने अपनी राजनीतिक पूंजी दांव पर लगाकर ऐसे कदम उठाए, जिन्हें उस समय काफी विवादास्पद माना जा रहा था।
  • उन्होंने सुधारों के लिए पूरी तरह से अपने वित्त मंत्री को स्वतंत्रता दी और राजनीतिक बैकअप उपलब्ध कराया।

वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की रणनीति

  • डॉ. मनमोहन सिंह, जो एक प्रख्यात अर्थशास्त्री और रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर रह चुके थे, को वित्त मंत्री बनाया गया।
  • 24 जुलाई 1991 को संसद में पेश किए गए उनके पहले बजट भाषण ने भारतीय अर्थव्यवस्था की दिशा ही बदल दी।
  • प्रमुख नीतिगत बदलाव:
  1. लाइसेंस-राज का अंत – अधिकांश उद्योगों को लाइसेंस और सरकारी अनुमति की आवश्यकता से मुक्त कर दिया गया।
  2. विदेशी निवेश के द्वार खोलना – पहली बार भारत ने प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) और तकनीकी सहयोग को अनुमति दी।
  3. आयात नीति का उदारीकरण – कई वस्तुओं पर लगे प्रतिबंध हटाए गए और टैरिफ (Import Tariffs) घटाए गए।
  4. विनिमय दर नीति (Exchange Rate Policy) – रुपये का आंशिक अवमूल्यन (Devaluation) किया गया, ताकि निर्यात प्रतिस्पर्धी हो सके।
  5. राजकोषीय सुधार – घाटे को नियंत्रित करने के लिए सब्सिडी पर अंकुश और कर संरचना को सरल बनाया गया।

डॉ. सिंह का वह ऐतिहासिक कथन आज भी याद किया जाता है — “No power on earth can stop an idea whose time has come.”

राजनीतिक जोखिम और विपक्ष का विरोध

  • इन सुधारों का तत्कालीन विपक्ष और कई राजनीतिक दलों ने जमकर विरोध किया।
  • उन्हें यह सुधार “देश बेचने”, “विदेशी कंपनियों को लाभ पहुंचाने” और “गरीब विरोधी” कहकर निशाना बनाया गया।
  • राव और सिंह को यह भी डर था कि कहीं संसद इन नीतियों को खारिज न कर दे। लेकिन राव के राजनीतिक कौशल और मनमोहन सिंह की साख (Credibility) ने मिलकर संसद और देश में सुधारों को स्वीकार्य बना दिया।

नेतृत्व का संतुलन

  • नरसिम्हा राव ने राजनीतिक संरक्षण और साहस दिया।
  • मनमोहन सिंह ने तकनीकी ज्ञान और नीति निर्माण से उसे लागू किया।
  • यह नेतृत्व का ऐसा संतुलन था, जिसने भारत को संकट से बाहर निकाला और 21वीं सदी की तेज़ आर्थिक वृद्धि का रास्ता तैयार किया।

ऐतिहासिक महत्व

  • राव और सिंह की जोड़ी को अक्सर भारत के आर्थिक उदारीकरण (Liberalization), निजीकरण (Privatization) और वैश्वीकरण (Globalization) — यानी LPG सुधार का जनक कहा जाता है।
  • यद्यपि IMF और विश्व बैंक के दबाव का योगदान था, लेकिन यह सुधार केवल “बाहरी दबाव” का परिणाम नहीं थे; इन्हें घरेलू नेतृत्व ने एक अवसर की तरह देखा और स्थायी नीति में बदला।

IMF और विश्व बैंक का योगदान

भारत का 1991 का आर्थिक सुधार केवल घरेलू राजनीतिक नेतृत्व का परिणाम नहीं था, बल्कि इसमें अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं की भी बड़ी भूमिका रही। भुगतान संतुलन संकट की स्थिति में भारत के पास विकल्प बेहद सीमित थे, और तत्काल विदेशी सहायता लेना अनिवार्य हो गया।

1. IMF से ऋण पैकेज

  • 1991 में भारत ने अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) से आपातकालीन सहायता मांगी।
  • IMF ने भारत को लगभग 2.2 बिलियन डॉलर का ऋण पैकेज उपलब्ध कराया।
  • इसके लिए भारत को अपनी आर्थिक नीतियों में संरचनात्मक सुधार (Structural Reforms) करने का वादा करना पड़ा।
  • IMF की शर्तें थीं:
  • व्यापार और आयात पर नियंत्रण कम करना,
  • रुपये का आंशिक अवमूल्यन (Devaluation),
  • सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका घटाना,
  • और राजकोषीय घाटे पर नियंत्रण।

2. विश्व बैंक की भूमिका

  • विश्व बैंक (World Bank) ने भी भारत को पुनर्गठन और विकास सहायता (Structural Adjustment Loans) उपलब्ध कराई।
  • विश्व बैंक ने केवल वित्तीय सहायता ही नहीं दी, बल्कि सुधारों के लिए तकनीकी सलाह और ढांचा (Framework) भी दिया।
  • उसने भारत को यह दिशा दिखाई कि उदारीकरण (Liberalization), निजीकरण (Privatization) और वैश्वीकरण (Globalization) ही दीर्घकालिक समाधान हैं।

3. घरेलू नेतृत्व और अंतर्राष्ट्रीय दबाव का संतुलन

  • यह कहना गलत नहीं होगा कि 1991 के सुधार दोनों ताक़तों का परिणाम थे:
  • अंतर्राष्ट्रीय दबाव (IMF और विश्व बैंक की शर्तें),
  • और घरेलू नेतृत्व की इच्छाशक्ति (नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह का साहस)।
  • यदि घरेलू राजनीतिक नेतृत्व केवल IMF की शर्तों को लागू करता, तो संभव है कि सुधार लंबे समय तक टिक नहीं पाते। लेकिन राव और सिंह ने इन्हें संकट से अवसर (Crisis into Opportunity) में बदल दिया और स्थायी नीति सुधार के रूप में लागू किया।

4. आलोचना और बहस

  • उस समय कई राजनीतिक दलों और विचारकों ने IMF और विश्व बैंक की शर्तों को भारत की आर्थिक संप्रभुता पर हमला बताया।
  • आलोचकों का कहना था कि भारत “विदेशी पूंजी और संस्थाओं” के हाथों में चला गया है।
  • लेकिन समय के साथ यह साफ हुआ कि इन सुधारों ने भारत को न केवल संकट से बाहर निकाला बल्कि 21वीं सदी की तेज़ आर्थिक वृद्धि की नींव रखी।

सुधारों के प्रमुख पहलू

1991 के आर्थिक सुधार भारत के लिए एक परिवर्तनकारी मोड़ साबित हुए। इन्हें अक्सर LPG नीति (Liberalization, Privatization, Globalization) के नाम से जाना जाता है। इन सुधारों के कई मुख्य पहलू थे, जिनका भारतीय अर्थव्यवस्था पर गहरा और दीर्घकालिक प्रभाव पड़ा।

1. लाइसेंस-राज का अंत (Liberalization)

  • सुधारों से पहले लगभग सभी उद्योगों को शुरू करने या विस्तार करने के लिए सरकारी लाइसेंस की आवश्यकता थी।
  • 1991 में उद्योग नीति (New Industrial Policy, 1991) के तहत अधिकांश क्षेत्रों में औद्योगिक लाइसेंस की अनिवार्यता समाप्त कर दी गई
  • केवल रक्षा, परमाणु ऊर्जा और रेलवे जैसे कुछ क्षेत्रों में ही लाइसेंस प्रणाली बनी रही।
  • इससे उद्योगपतियों को अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाने और नई परियोजनाओं में निवेश करने की स्वतंत्रता मिली।

2. विदेशी निवेश को प्रोत्साहन (Privatization + FDI Reforms)

  • पहली बार भारत ने बड़े पैमाने पर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) और विदेशी तकनीकी सहयोग (Foreign Technology Collaboration) की अनुमति दी।
  • ऑटोमोबाइल, दूरसंचार, सूचना प्रौद्योगिकी, और फार्मास्यूटिकल जैसे क्षेत्रों में विदेशी कंपनियों ने भारत में निवेश करना शुरू किया।
  • उदाहरण: 1990 के दशक में Suzuki, Coca-Cola, PepsiCo जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत में लौटीं या आईं।
  • सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों (PSUs) में भी आंशिक विनिवेश (Disinvestment) शुरू किया गया।

3. आयात-निर्यात नीति में उदारीकरण (Globalization)

  • पहले आयात पर ऊँचे शुल्क (Import Tariffs) और कोटा (Quotas) लगाए जाते थे।
  • सुधारों के बाद इन टैरिफ़ को धीरे-धीरे कम किया गया और कई वस्तुओं पर प्रतिबंध हटा दिए गए।
  • रुपये का आंशिक अवमूल्यन (Devaluation) किया गया, जिससे निर्यातक अंतर्राष्ट्रीय बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी हो सके।
  • निर्यात प्रोत्साहन योजनाओं को बढ़ावा दिया गया, जिससे भारतीय वस्त्र उद्योग, आईटी सेवाएं और फार्मा क्षेत्र को वैश्विक स्तर पर पहचान मिली।

4. कर प्रणाली में सुधार (Tax Reforms)

  • सुधारों से पहले भारत की कर संरचना जटिल और बोझिल थी।
  • 1991 के बाद इसे सरल बनाया गया और कर दरों को घटाकर अधिक तर्कसंगत किया गया।
  • प्रत्यक्ष कर (Direct Taxes) में दरें कम की गईं, ताकि कर चोरी (Tax Evasion) घटे और कर आधार (Tax Base) बढ़े।
  • अप्रत्यक्ष कर प्रणाली (Indirect Taxes) में भी सुधार शुरू हुए, जिनका विस्तार आगे चलकर GST (Goods and Services Tax) तक हुआ।

5. राजकोषीय घाटा कम करने के प्रयास (Fiscal Reforms)

  • 1991 में भारत का राजकोषीय घाटा GDP का लगभग 8% था। इसे कम करने के लिए कई उपाय किए गए:
  • सब्सिडी पर नियंत्रण (विशेषकर खाद और तेल में),
  • सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों में सुधार और विनिवेश,
  • और सरकारी खर्चों में कटौती
  • इन सुधारों का उद्देश्य था अर्थव्यवस्था को वित्तीय स्थिरता प्रदान करना और दीर्घकालिक विकास का रास्ता साफ करना।

नीतिगत बदलावों का असर

1991 के आर्थिक सुधार भारत की दिशा बदलने वाले साबित हुए। सुधारों के तुरंत बाद और अगले एक दशक में भारतीय अर्थव्यवस्था ने उल्लेखनीय परिवर्तन देखे।

1. GDP वृद्धि दर में तेजी

  • सुधारों से पहले भारत की औसत GDP वृद्धि दर 3–3.5% (जिसे “Hindu Rate of Growth” कहा जाता था) पर अटकी हुई थी।
  • सुधारों के बाद 1990 के दशक में औसत वृद्धि दर 6% के करीब पहुँच गई।
  • 2000 के दशक में यह और बढ़कर 8% तक पहुँची, जिससे भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो गया।

2. निजी क्षेत्र का विस्तार

  • लाइसेंस-राज खत्म होने से उद्योगों को स्वतंत्रता मिली।
  • आईटी सेक्टर, ऑटोमोबाइल, फार्मास्यूटिकल, और टेलीकॉम जैसे क्षेत्रों में निजी कंपनियों का तेजी से विस्तार हुआ।
  • Infosys, Wipro, Tata Consultancy Services (TCS) जैसी कंपनियों ने 1990 के दशक में वैश्विक पहचान बनानी शुरू की।

3. विदेशी मुद्रा भंडार में मजबूती

  • 1991 में जहाँ भारत के पास केवल 1.2 बिलियन डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार था, वहीं 2000 के दशक की शुरुआत तक यह 100 बिलियन डॉलर से अधिक हो गया।
  • आज (2025 तक) भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 600 बिलियन डॉलर से ऊपर है, जो सुधारों की लंबी अवधि की सफलता का प्रमाण है।

4. व्यापार और निवेश में वृद्धि

  • आयात-निर्यात नीतियों के उदारीकरण से भारत का अंतर्राष्ट्रीय व्यापार तेज़ी से बढ़ा।
  • 1991 के बाद विदेशी कंपनियों ने भारत में बड़े पैमाने पर निवेश करना शुरू किया।
  • FDI (Foreign Direct Investment) में लगातार वृद्धि हुई और भारत एक आकर्षक निवेश गंतव्य बना।

5. रोजगार और शहरीकरण पर प्रभाव

  • निजी क्षेत्र के विस्तार से नए रोजगार सृजित हुए।
  • आईटी और सेवा क्षेत्र (Service Sector) के उभार ने लाखों युवाओं को रोजगार दिया।
  • इसके साथ ही शहरीकरण (Urbanization) भी तेज हुआ, क्योंकि लोग बेहतर अवसरों की तलाश में शहरों की ओर बढ़े।

6. वैश्विक स्तर पर भारत की छवि

  • सुधारों से पहले भारत को एक बंद और धीमी अर्थव्यवस्था के रूप में देखा जाता था।
  • सुधारों के बाद भारत की पहचान उभरते हुए वैश्विक आर्थिक शक्ति के रूप में बनने लगी।
  • 2000 के दशक में “BRICS” देशों (Brazil, Russia, India, China, South Africa) में भारत को खास महत्व मिला।

7. सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव

  • सुधारों ने भारत की सोच को भी बदला। अब केवल “गरीबी उन्मूलन” और “समान वितरण” के बजाय विकास, प्रतिस्पर्धा और नवाचार पर ध्यान दिया जाने लगा।
  • हालांकि, राजनीतिक बहस में सुधारों को लेकर मतभेद बने रहे। एक वर्ग ने इसे “गरीब विरोधी” कहा, जबकि दूसरा वर्ग इसे “भारत की आर्थिक मुक्ति” मानता है।

सोशलिस्ट से कैपिटलिस्ट सोच की ओर बदलाव

1. स्वतंत्रता के बाद भारत की वैचारिक दिशा

1947 में आज़ादी के बाद भारत ने एक मिश्रित अर्थव्यवस्था (Mixed Economy) का मॉडल अपनाया। इसका आधार था:

  • सोशलिस्ट प्रेरणा: पंडित नेहरू और उनके समकालीन नेताओं ने सोवियत संघ की योजना-आधारित अर्थव्यवस्था से प्रेरणा ली।
  • पब्लिक सेक्टर का वर्चस्व: “महानगरिक उद्योग” जैसे स्टील, कोयला, बिजली, परिवहन और बैंकिंग मुख्य रूप से सरकारी नियंत्रण में रखे गए।
  • योजना आयोग की भूमिका: 1951 से शुरू हुई पाँच वर्षीय योजनाओं में सरकार विकास की धुरी बनी।

यह सोच “गरीबी हटाओ” और “समान अवसर” पर केंद्रित थी। परंतु निजी क्षेत्र और प्रतिस्पर्धा पर भरोसा कम था।

2. 1960–80 का दौर: “लाइसेंस-परमिट-राज”

  • निजी उद्योगों के लिए किसी भी उत्पादन या विस्तार के लिए सरकार से लाइसेंस लेना अनिवार्य था।
  • आयात-निर्यात पर भारी प्रतिबंध थे।
  • इस व्यवस्था को आलोचक “लाइसेंस-परमिट-राज” कहते थे, जिसने नवाचार और प्रतिस्पर्धा को रोक दिया।
  • परिणामस्वरूप, अर्थव्यवस्था “धीमी चाल” (Hindu Rate of Growth – लगभग 3%) पर ही अटकी रही।

3. 1991: मजबूरी से अवसर की ओर

1991 का आर्थिक संकट इस मॉडल की सीमाओं को उजागर कर चुका था। भारत के पास विकल्प था –

  • या तो सोशलिस्ट ढाँचे में बने रहना और विदेशी मुद्रा संकट का सामना करना,
  • या फिर वैश्विक अर्थव्यवस्था में शामिल होना और उदारीकरण, निजीकरण व वैश्वीकरण (LPG Model) को अपनाना।

डॉ. मनमोहन सिंह और प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने दूसरा रास्ता चुना।

4. सोच का परिवर्तन

  • अब सरकार “उद्योगों की मालिक” न रहकर “सुविधा प्रदाता और नियामक” बनी।
  • निजी क्षेत्र को अधिक स्वतंत्रता और प्रतिस्पर्धा का अवसर दिया गया।
  • विदेशी निवेशकों का स्वागत किया गया और भारत की आर्थिक नीतियों में कैपिटलिस्ट तत्व मजबूती से जुड़ गए।

5. असर: वैचारिक बदलाव के प्रमाण

  • उद्योग जगत: टाटा, बिरला, रिलायंस जैसे उद्योग समूहों के साथ-साथ नए निजी उद्यमियों (Infosys, Wipro) ने भी पहचान बनाई।
  • समाज: उपभोक्ताओं के लिए विकल्प बढ़े। 1980 तक जहाँ बाजार में सीमित घरेलू उत्पाद ही उपलब्ध थे, वहीं 1995 के बाद से भारतीय घरों में विदेशी कंपनियों के प्रोडक्ट्स भी आसानी से आने लगे।
  • राजनीति: अब लगभग सभी राजनीतिक दल यह स्वीकार करने लगे कि बिना बाजार-उन्मुख सुधारों के भारत आर्थिक रूप से आगे नहीं बढ़ सकता।

6. संतुलन का सवाल

हालाँकि भारत पूरी तरह कैपिटलिस्ट अर्थव्यवस्था नहीं बना। सरकार ने अभी भी कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक कल्याण योजनाओं पर नियंत्रण और खर्च बनाए रखा।
यानी भारत का मॉडल अब “सामाजिक न्याय और बाजार सुधारों” का मिश्रण बन गया।

नेतृत्व को मिला श्रेय — एक राजनीतिक कथा

समय बीतने के साथ, 1991 के सुधारों की सफलता का श्रेय मुख्य रूप से एक वित्त मंत्री के नाम पर केंद्रित हो गया। यह सच है कि वित्त मंत्री की भूमिका बेहद अहम थी, लेकिन राजनीतिक संरचना, निर्णय लेने का साहस, और सुधारों के लिए सहमति बनाना—ये सभी कार्य प्रधानमंत्री और उनके नेतृत्व की भी उतनी ही बड़ी देन थे।

Dr. Manmohan Singh और P.V. Narasimha Rao, 1991 के आर्थिक सुधारों के मुख्य स्तंभ।

Credit: Hindustan Times

फिर भी, सार्वजनिक चर्चा और मीडिया में प्रधानमंत्री का नाम अपेक्षाकृत कम लिया गया। शायद इसका कारण यह था कि सुधारों का श्रेय एक “टेक्नोक्रेट” चेहरे को देना राजनीतिक रूप से सुविधाजनक था।

वर्तमान संदर्भ में सीख

बहुत बढ़िया 👍 अब मैं आपके लिए अगला हिस्सा विस्तार से और तथ्यात्मक रूप से लिख रहा हूँ:

1991 आर्थिक सुधारों के दीर्घकालिक प्रभाव

1. गरीबी और रोजगार पर असर

  • गरीबी में कमी:
  • 1993-94 में भारत की गरीबी दर लगभग 45% थी, जो 2011-12 तक घटकर 22% रह गई।
  • विश्व बैंक के अनुसार, आर्थिक सुधारों और तेज विकास दर के चलते 27 करोड़ से अधिक लोग गरीबी रेखा से ऊपर उठे।
  • रोजगार की चुनौती:
  • सुधारों के बाद सेवा क्षेत्र (IT, टेलीकॉम, बैंकिंग) में रोजगार बढ़ा।
  • लेकिन कृषि और असंगठित क्षेत्र में पर्याप्त रोजगार सृजन नहीं हुआ।
  • यही कारण है कि सुधारों की आलोचना “जॉबलेस ग्रोथ” के रूप में भी की जाती है।

2. मध्यम वर्ग का उदय

  • 1991 से पहले मध्यम वर्ग सीमित था और उनकी क्रय शक्ति कम थी।
  • सुधारों के बाद:
  • नई नौकरियों और उच्च वेतन से लाखों लोग मध्यम वर्ग में आए।
  • उपभोक्ता संस्कृति बढ़ी — कार, मोबाइल, टीवी, फैशन ब्रांड अब आम घरों तक पहुँचे।
  • आज भारत में 30 करोड़ से अधिक लोगों का मध्यम वर्ग है, जो देश की अर्थव्यवस्था और राजनीति दोनों को प्रभावित करता है।

3. औद्योगिक और तकनीकी विकास

  • IT और BPO क्रांति: 1990 के दशक में उठे सुधारों के कारण Infosys, TCS, Wipro जैसे IT दिग्गज उभरे।
  • टेलीकॉम सेक्टर: BSNL/MTNL के एकाधिकार से आगे बढ़कर निजी कंपनियों (Airtel, Jio, Vodafone) ने मोबाइल क्रांति लाई।
  • ऑटोमोबाइल उद्योग: Maruti-Suzuki से शुरुआत करके Hyundai, Honda, Toyota जैसी कंपनियों ने भारतीय बाजार में प्रवेश किया।

4. असमानता और क्षेत्रीय अंतर

  • सुधारों से जहाँ शहरी मध्यम वर्ग को लाभ हुआ, वहीं ग्रामीण और गरीब तबके में अपेक्षाकृत कम सुधार दिखा।
  • क्षेत्रीय विषमता: महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक, गुजरात जैसे औद्योगिक राज्यों में विकास तेज़ हुआ, जबकि बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में अपेक्षाकृत धीमा रहा।
  • आय में असमानता बढ़ी — धनाढ्य और गरीब के बीच का अंतर अधिक स्पष्ट हुआ।

5. वैश्विक परिदृश्य में भारत

  • 1991 में भारत एक बंद और संकोची अर्थव्यवस्था था।
  • आज भारत:
  • विश्व की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है (IMF, 2022)।
  • IT सेवाओं में ग्लोबल हब बन चुका है।
  • G20, WTO, BRICS जैसे मंचों पर सक्रिय भूमिका निभा रहा है।
  • यह परिवर्तन सीधे 1991 के सुधारों की नींव से जुड़ा है।

6. आलोचनाएँ और सीमाएँ

  • कृषि सुधारों की कमी: 1991 सुधार मुख्यतः उद्योग और सेवा क्षेत्र तक सीमित रहे।
  • निजीकरण की आलोचना: सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों की बिक्री को “सस्ते में संपत्ति बेचने” जैसा बताया गया।
  • सामाजिक सुरक्षा की कमी: स्वास्थ्य और शिक्षा क्षेत्र पर पर्याप्त सुधार नहीं हुए, जिससे असमानता बनी रही।

निष्कर्ष

1991 के आर्थिक सुधारों ने भारत की दिशा ही बदल दी।

  • एक तरफ़ उन्होंने गरीबी कम की, विकास दर बढ़ाई, और भारत को वैश्विक मंच पर स्थापित किया।
  • दूसरी तरफ़, उन्होंने असमानता, बेरोजगारी और क्षेत्रीय विषमता जैसी नई चुनौतियाँ भी पैदा कीं।

संक्षेप में, 1991 सुधार भारत की आर्थिक क्रांति थे, जिनके प्रभाव आज भी हर भारतीय महसूस करता है।

FAQs

Q1. क्या 1991 के सुधार केवल IMF के दबाव में किए गए थे?
आंशिक रूप से हाँ, लेकिन यह भी सच है कि घरेलू नेतृत्व ने इन्हें अवसर में बदल दिया।

Q2. सुधारों के सबसे बड़े लाभ क्या रहे?
GDP वृद्धि, विदेशी निवेश में वृद्धि, और निजी क्षेत्र का विस्तार।

Q3. क्या सोशलिस्ट नीतियां पूरी तरह असफल थीं?
नहीं, लेकिन लंबे समय में वे विकास की गति को सीमित करने लगीं।

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