आतंकवाद पर पक्षपातपूर्ण नजरिया
मालेगांव केस से सामने आया भारत में आतंकवाद पर राजनीति और तुष्टिकरण का पक्षपातपूर्ण नजरिया। जानें कैसे धर्म और राजनीति तुष्टिकरण से जुड़ते हैं भारत में आतंकवाद के साथ।

भारत में आतंकवाद को केवल सुरक्षा का विषय नहीं बल्कि राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया गया है। खासकर जब इसे धर्म और पहचान से जोड़ा जाता है, तो समस्या और अधिक गहरी हो जाती है। “आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता” यह वाक्य अक्सर तब कहा जाता है जब किसी विशेष समुदाय से संबंधित आतंकवादी सामने आते हैं। लेकिन जब किसी अपवादस्वरूप घटना में हिंदू पहचान के लोग आरोपी होते हैं, तब उसी समाज में “भगवा आतंकवाद” जैसे शब्द सामने आ जाते हैं।
सांप्रदायिक सहानुभूति और मौन
आश्चर्य की बात यह है कि जब आतंकवादी हमलों में इस्लामिक चरमपंथी पकड़े जाते हैं और धर्म के नाम पर नारे लगाते हैं, तब उनके समर्थन में खुलकर निंदा करने वालों की संख्या नगण्य होती है। वहीं जब उसी समुदाय पर कठोर कार्रवाई होती है, तो विरोध की बाढ़ आ जाती है।
मालेगांव घटनाओं पर अदालत का फैसला
मालेगांव केस: न्याय और राजनीति का टकराव
मालेगांव बम धमाका (2008) में साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, ले. कर्नल प्रसाद पुरोहित, अजय राहिरकर, सुधाकर चतुर्वेदी, समीर कुलकर्णी और अन्य को आरोपी बनाया गया। वर्षों की सुनवाई और जांच के बाद 31 जुलाई 2025 को विशेष एनआईए अदालत ने सभी को बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि आरोपियों के खिलाफ कोई “विश्वसनीय और ठोस सबूत” नहीं थे।
यह फैसला कई सवाल खड़े करता है:
- क्या जांच एजेंसियों पर राजनीतिक दबाव था?
- क्या इसे भगवा आतंकवाद कहकर एक खास नैरेटिव गढ़ा गया?
- क्या मीडिया ने बिना सत्यापन के आरोपियों को दोषी बना दिया?
फैसले की प्रतिक्रियाएं
- भाजपा और समर्थकों ने फैसले को “सत्य की जीत” बताया।
- विपक्षी दलों ने सवाल उठाया कि असली दोषी कौन हैं?
- पीड़ित परिवारों ने फैसले के खिलाफ उच्च न्यायालय जाने की घोषणा की।
भारतीय राजनीति में धर्म और सुरक्षा का समीकरण
धर्म आधारित तुष्टिकरण का प्रभाव
भारत में कई राजनीतिक दलों ने धार्मिक समुदायों को प्रसन्न करने के लिए तुष्टिकरण की नीति अपनाई है।
- तीन तलाक मामला: राजीव गांधी सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलटना तुष्टिकरण की मिसाल बना।
- कट्टरपंथियों पर नरमी: कई बार भड़काऊ बयान देने वाले नेताओं पर कार्रवाई नहीं होती, क्योंकि उनका संबंध किसी खास वोट बैंक से होता है।
- CAA विरोध: प्रदर्शन के नाम पर देश को बंधक बनाने वाले कई चेहरों को समर्थन मिला क्योंकि वे खास धार्मिक पहचान से जुड़े थे।
सुरक्षा बनाम वोट बैंक
जब राष्ट्रीय सुरक्षा की बात आती है, तो निर्णय लेने में अक्सर राजनीतिक समीकरण हावी हो जाते हैं। उदाहरण के लिए:
- PFI जैसे संगठनों पर वर्षों तक बैन नहीं लगा क्योंकि राजनीतिक दल उनकी धार्मिक पहचान से जुड़े वोटों को नाराज़ नहीं करना चाहते थे।
- आतंकवाद से लड़ने की नीति तब तक अधूरी है जब तक वो “समान रूप से” सभी विचारधाराओं पर लागू न हो।
तुष्टिकरण की राजनीति के परिणाम
- सामाजिक ध्रुवीकरण बढ़ता है
- न्यायिक प्रक्रिया पर लोगों का भरोसा कम होता है
- राष्ट्र की सुरक्षा नीति कमजोर होती है
- मीडिया की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लगता है
मीडिया और बुद्धिजीवी वर्ग का दोहरा मापदंड
जब इस्लामिक आतंकवादी घटनाएं होती हैं जैसे 26/11, ISIS हमले, या पुलवामा, तब इन्हें कुछ “मानवाधिकार समर्थकों” द्वारा सांप्रदायिक रंग देने से बचाया जाता है। लेकिन जब हिंदू नाम वाला व्यक्ति आरोपी होता है, तो तुरंत “हिंदू आतंकवाद” जैसे शब्द चलन में आ जाते हैं।
समाधान की दिशा में प्रयास
- निष्पक्ष जांच और रिपोर्टिंग: राजनीतिक दबाव से मुक्त एजेंसियों की ज़रूरत है।
- राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी: आतंकवाद को धर्म से जोड़ने के बजाय, उसे कानून और सुरक्षा के चश्मे से देखा जाए।
- मीडिया की भूमिका: मीडिया को बिना पक्षपात के तथ्यों पर आधारित रिपोर्टिंग करनी चाहिए।
- सामाजिक संगठनों का दायित्व: धार्मिक सद्भावना और राष्ट्रहित को प्राथमिकता दी जाए।
निष्कर्ष
“भारत में आतंकवाद पर राजनीति और तुष्टिकरण” न केवल एक सामाजिक और सुरक्षा समस्या है, बल्कि यह लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करने वाला तत्व भी बन चुका है। जब तक हम आतंकवाद को निष्पक्षता से नहीं देखेंगे और तुष्टिकरण की राजनीति का त्याग नहीं करेंगे, तब तक न तो न्याय मिलेगा और न ही सुरक्षा। आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता — यह बात तभी मानी जानी चाहिए जब हम सभी मामलों में इसे समान रूप से लागू करें, न कि चयनित उदाहरणों पर।
FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले सवाल)
Q1: क्या मालेगांव केस में सभी आरोपी बरी हो गए?
हाँ, 31 जुलाई 2025 को सभी आरोपियों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया।
Q2: तुष्टिकरण से क्या नुकसान होता है?
तुष्टिकरण से न्यायिक प्रणाली, राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक संतुलन कमजोर होता है।
Q3: क्या आतंकवाद पर राजनीतिक दृष्टिकोण निष्पक्ष होता है?
अक्सर नहीं। आतंकवाद पर राजनीतिक दृष्टिकोण पक्षपाती और वोट बैंक आधारित होता है।
Q4: भगवा आतंकवाद शब्द कहां से आया?
यह शब्द 2008 के मालेगांव धमाकों के बाद मुख्यधारा में आया, जब कुछ आरोपियों का संबंध हिंदू संगठनों से जोड़ा गया।
Q5: क्या भारत में आतंकवाद पर निष्पक्ष नीति संभव है?
हां, लेकिन इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति, मीडिया की ईमानदारी और जनता की सजगता जरूरी है।
